॥ हरि: शरणम्‌ !॥

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

यदि भगवान्‌ के पास कामना लेकर जायँगे तो भगवान्‌ संसार बन जायँगे और यदि संसार के पास निष्काम होकर जायँगे तो संसार भी भगवान्‌ बन जाएगा। अत: भगवान्‌ के पास उनसे प्रेम करने के लिए जाएँ और संसार के पास सेवा करने के लिए, और बदले में भगवान्‌ और संसार दोनों से कुछ न चाहें तो दोनों से ही प्रेम मिलेगा। - स्वामी श्रीशरणानन्दजी

मानवता के मूल सिद्धान्त

  • आत्म-निरीक्षण, अर्थात्‌ प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखना।
  • की हुई भूल को पुन: न दोहराने का व्रत लेकर, सरल विश्वासपूर्वक प्रार्थना करना।
  • विचार का प्रयोग अपने पर और विश्वास का दूसरों पर, अर्थात्‌ न्याय अपने पर और प्रेम तथा क्षमा अन्य पर।
  • जितेन्द्रियता, सेवा, भगवच्चिन्तन और सत्य की खोज द्वारा अपना निर्माण।
  • दूसरों के कर्तव्य को अपना अधिकार, दूसरों की उदारता को अपना गुण और दूसरों की निर्बलता को अपना बल, न मानना।
  • पारिवारिक तथा जातीय सम्बन्ध न होते हुए भी, पारिवारिक भावना के अनुरुप ही पारस्परिक सम्बोधन तथा सद्भाव, अर्थात्‌ कर्म की भिन्नता होने पर भी स्नेह की एकता।
  • निकटवर्ती जन-समाज की यथाशक्ति क्रियात्मक रुप से सेवा करना।
  • शारीरिक हित की दृष्टि से आहार-विहा‌र में संयम तथा दैनिक कार्यों में स्वावलम्बन।
  • शरीर श्रमी, मन संयमी, बुद्धि विवेकवती, हृदय अनुरागी तथा अहम्‌ को अभिमान शून्य करके अपने को सुन्दर बनाना।
  • सिक्के से वस्तु, वस्तु से व्यक्ति, व्यक्ति से विवेक तथा विवेक से सत्य को अधिक महत्व देना।
  • व्यर्थ-चिन्तन-त्याग तथा वर्तमान के सदुपयोग द्वारा भविष्य को उज्जवल बनाना।
[द्रष्टव्य-प्रार्थना और इन ग्यारह नियमों की विस्तृत व्याख्या मानव सेवा संघ द्वारा प्रकाशित “मानवता के मूल सिद्धान्त” नामक पुस्तक में देखें।]

मानव सेवा संघ

साधक-सेवा
इनमें लगभग पचास साधक स्थाई रूप से रह कर अपनी सेवा एवं साधना में रत हैं | इसके अतिरिक्त साधन दृष्टि से बाहर से भी साधक महानुभाव बीच-बीच में आते जाते रहते हैं जिनके रहने भोजन प्रसाद आदि की व्यवस्था आश्रम करता है
चिकित्सा-सेवा
चिकित्सा के अंतर्गत होम्योपैथिक डिस्पेंसरी, आयुर्वेदिक चिकित्सालय, नेत्र चिकित्सा, और दंत चिकित्सा संचालित है | जिसमें वृंदावन नगर के अतिरिक्त दूरदराज के ग्रामीण अंचलों से भी रोगी आकर चिकित्सा लाभ लेते हैं|
अन्नक्षेत्र-सेवा
अन्नक्षेत्र के अंतर्गत नित्य प्रातः काल खिचड़ी एवं (छाछ) मट्ठा का वितरण किया जाता है | इसके अतिरिक्त समय समय पर बाहर से आए आगंतुक महानुभावों के सहयोग से जलेबी कचोरी एवं वस्त्र आदि का वितरण भी जरूरतमंदों में किया जाता है | जिसमें प्रतिदिन लगभग 50 से 100 भिक्षुक प्रसाद ग्रहण करते हैं
गौ-सेवा
पूज्यपाद स्वामी श्री शरणानंद जी महाराज द्वारा स्थापित एक गौशाला भी आश्रम परिसर में संचालित है | जिसमें साहीवाल नस्ल के लगभग 65-70 गौवंश हैं |
वृक्ष-सेवा
पर्यावरण की दृष्टि से आश्रम परिसर में प्रतिवर्ष वर्षा-काल के समय में विभिन्न प्रजातियों के छायादार वृक्षों का रोपण किया जाता है |
जल-सेवा
आश्रम की ओर से एक प्याऊ का निर्माण भी कराया गया है | जिसमें वाटर-कूलर लगाकर शीतल-जल की व्यवस्था की गई है | जिससे ग्रीष्म-ऋतु में राहगीरों को शीतल-जल मिल सके, इसके अतिरिक्त वर्ष में दो बार अक्षय तृतीया एवं निर्जला-एकादशी को आश्रम द्वारा शरबत-सेवा भी संचालित की जाती है |

प्रार्थना - 1

मेरे नाथ !
आप अपनी सुधामयी, सर्व-समर्थ, पतितपावनी, अहैतुकी कृपा से, दु:खी प्राणियों के हृदय में, त्याग का बल एवं सुखी प्राणियों के हृदय में, सेवा का बल प्रदान करें; जिससे वे सुख-दु:ख के बन्धन से मुक्त हो, आपके पवित्र-प्रेम का आस्वादन कर, कृत-कृत्य हो जाएँ।

प्रार्थना - 2


मेरे नाथ !
आप अपनी सुधामयी, सर्व-समर्थ, पतितपावनी, अहैतुकी कृपा से
मानव-मात्र को विवेक का आदर तथा बल का सदुपयोग करने की सामर्थ्य प्रदान करें एवं हे करुणा सागर ! अपनी अपार करुणा से शीघ्र ही राग-द्वेष का नाश करें। सभी का जीवन सेवा-त्याग-प्रेम से परिपूर्ण हो जाए।