साधन युक्त जीवन ही मानव जीवन है

जीवन का निरीक्षण करने पर हम अपने को अन्य प्राणियों की तुलना में विवेकी तथा विश्वासी पाते हैं | साथ ही अपने में देह-जनित स्वभावों की अनेक आसक्तियों का समूह भी देखते हैं | उन आसक्ति-जनित निर्बलताओं से पीड़ित होकर ही हम उन्हें मिटाने के लिए विवेक के प्रकाश में विकल्प-रहित विश्वास के आधार पर जीवन को साधन-पारायण बनाने का यत्न करते हैं | उस साधनयुक्त जीवन को ही मानव-जीवन कहते हैं |

साधन-रहित जीवन मानव-जीवन नहीं है और साधनातीत जीवन भी मानव-जीवन नहीं है | साधन-रहित जीवन तो पशु-जीवन है और साधनातीत जीवन दिव्य, चिन्मय एवं पूर्ण जीवन है | दूसरे शब्दों में मानव-जीवन वह जीवन है जिसमें दिव्यता, चिन्मयता और पूर्णता की लालसा एवं देहजनित स्वभाव अर्थात् इन्द्रिय-जन्य आसक्ति रूपी निर्बलताएँ दोनों एक साथ विद्यमान हैं |

स्वाभाविक आवश्यकता की पूर्ति तथा अस्वाभाविक इच्छाओं की निवृत्ति करना ही मानव-जीवन का लक्ष्य है | दिव्यता, चिन्मयता, नित्यता एवं पूर्णता की प्राप्ति मानव की स्वाभाविक आवश्यकता है | इन्द्रिय-जन्य ज्ञान में सद्भाव होने से जो राग होता है, उससे प्रेरित होकर जिन इच्छाएँ हैं |

स्वाभाविक आवश्यकता उसी की होती है जिससे जातीय तथा स्वरूप की एकता हो | अस्वाभाविक इच्छा उसी की होती है, जिससे मानी हुई एकता और स्वरूप से भिन्नता हो | दिव्यता, चिन्मयता, नित्यता एवं पूर्णता हमें स्वभावतः प्रिय हैं, पर इन्द्रिय-जन्य विषयासक्ति ने उस स्वाभाविक आवश्यकता को ढक-सा लिया है और अस्वाभाविक इच्छाओं को उत्पन्न कर दिया है | इसके फलस्वरूप हम मानवता से विमुख होकर पशुता में प्रवृत्त तथा उसकी ओर अग्रसर होते हैं, जो वास्तव में प्रमाद है | अतः जिससे जातीय तथा स्वरूप की एकता है उसकी प्राप्ति और जिससे मानी हुई एकता एवं स्वरूप की भिन्नता है उसकी निवृत्ति करना ही मानव-जीवन का मुख्य उद्देश्य है |

यद्यपि “है” कभी अप्राप्त नहीं है, परन्तु “नहीं”, अर्थात् वस्तु आदि जिनसे केवल मानी हुई एकता है, उनकी आसक्ति से, जो वास्तव में प्राप्त है वह अप्राप्त जैसा प्रतीत होता है, और जो प्राप्त नहीं है, अर्थात् जिसकी प्राप्ति सम्भव ही नहीं है, वह प्राप्त-जैसा प्रतीत होता है | जब मानव निज विवेक के प्रकाश में अपने को “यह” से विमुख कर लेता है तब उसमें ‘है’ का योग, बोध तथा प्रेम स्वतः हो जाता है | बस, यही “है” की प्राप्ति है | इस प्रकार ‘है’ की प्राप्ति और ‘नहीं’ की निवृत्ति ही मानव जीवन की पूर्णता है |