‘हे नाथ’! पुकार की महिमा.

‘मेरे नाथ’ – इसका प्रादुर्भाव हुआ था उदयपुर में । एक दु:खी प्राणी या दु:खी साधक को देखकर यह उदित हुआ । ’मेरे नाथ’ – आप मेरे हैं, इसलिये प्यारे है । ‘नाथ’ पद का प्रयोग मालूम है किसके लिये किया जाता है? जो रक्षक हो और समर्थ हो ।

‘मेरे नाथ’ वाक्य से जो बोधार्थ नि:सृत होगा, उसके तीन रूप होंगे – प्रियता, निश्चिन्तता और निर्भयता । यदि किसी भाई या बहिन के जीवन में निश्चिन्तता और निर्भयता है तो आप ही बताइये, इससे ऊँचा जीवन और क्या हो सकता है? परन्तु ध्यान रहे, यह निश्चिन्तता और निर्भयता नासमझी से भी होती है, और बेशर्माई से भी होती है । बेशर्माई से जो होती है, उसमें प्रियता नहीं होती, उसमें सुखासक्ति होती है । इसलिये निश्चिन्तता और निर्भयता से पहले प्रियता अपेक्षित है ।

मैं तो लोगो से कहता हूँ कि यदि तुम्हारे दिल में घबराहट हो और उस घड़ी कहीं तुम्हारे लबपर आ जाय – ‘मेरे नाथ !’ तो आप सच मानिये, आपकी घबराहट नाश हो जायगी । उस क्षण यदि आपको याद आ जाय कि आप अनाथ नहीं, सनाथ हैं तो भय कैसे निवास करेगा? भय तो अनाथ के जीवन में निवास करता है । जो सनाथ है, उसके जीवन में भय कहाँ से आयेगा? उसके जीवन में नीरसता कहाँ से आयेगी? वह असमर्थता से पीड़ित क्यों होगा? असमर्थता से पीड़ित वही होगा, जो अनाथ है । नन्हा-सा बालक अपनी माँ की गोद में क्या असमर्थता का अनुभव करता है? (जीवन दर्शन)

‘मेरे नाथ’ से सुन्दर शब्द अपनी भाषा में नहीं हैं । (प्रेरणा पथ-पेज-१६५)

‘मेरे नाथ’-इस वाक्यका उच्चारण करते ही ऐसा हृदयमें भास होता है कि हम अनाथ नहीं हैं, कोई हमारा अपना है। और जो हमारा अपना है, वह कैसा है? वह समर्थ है और रक्षक है। अब आप सोचिये कि समर्थ और रक्षकके होते हुए हमारे और आपके जीवनमें चिन्ता और भयका कोई स्थान ही नहीं रहता।(संतवाणी-८-पेज-३५)