गलत नहीं करने में मनुष्य मात्र स्वाधीन है

नापसन्द करने से नाशवान् की विस्मृति  होगी–यह साधन हुआ; और पसंद करने से अविनाशी की स्मृति जगेगी, लालसा जगेगी–यह भजन हो गया। विचारकों ने कहा–गलत मत करो और श्रद्धालुओं ने कह दिया–सही करो। जो गलत नहीं करता मुक्त हो जाता है, और जो सही करता है वह भक्त है। जो गलत नहीं करता वह किसी को बुरा नहीं लगता, और जो सही करता है वह सबको प्यारा लगता है।

गलत नहीं करने में मनुष्य–मात्र स्वाधीन है; इसमें अन्य व्यक्ति तथा वस्तु की जरुरत नहीं होती। इसीलिए मुक्त होने में तो सभी स्वाधीन है। परंतु सही करने में किसी सबल का सहारा लेना पड़ता है, और सबल तो एक  प्रभु ही है।

इसलिए भक्त होने के लिए भगवान् का सहारा लेना पड़ता ही है। परंतु दोष और कामनाओं का त्याग तो दोनों को ही करना पड़ेगा। क्योंकि जब एक दोष और कामनायें रहेंगी, तब तक तो गलत ही करेगा। गलत करने वाला न तो मुक्त ही हो सकता है और न भक्त ही।

जो ‘स्व’ में संतुष्ट हो जाता है उसमें उदारता और प्रेम की स्वत: अभिव्यक्ति हो जाती है।  कारण, जब वह पराश्रय-युक्त अपने पूर्व जीवन को देखता है, तब दूसरों को भी पराश्रय से दु:खी देखकर करुणित हो उठता है और जब ‘स्व’ में संतुष्ट अपने वर्तमान जीवन को देखता है तो हमारा कोई रचयिता भी है­–इस बात की याद आते ही उसके हृदय में प्रेम का प्रादुर्भाव हो जाता है।

अतएव गलत मत करो और ठीक करने का फल मत चाहो, अभिमान मत करो और प्रभु का आश्रय ग्रहण करो। ॐ आनन्द !