गलत नहीं करने में मनुष्य मात्र स्वाधीन है

नापसन्द करने से नाशवान् की विस्मृति  होगी–यह साधन हुआ; और पसंद करने से अविनाशी की स्मृति जगेगी, लालसा जगेगी–यह भजन हो गया। विचारकों ने कहा–गलत मत करो और श्रद्धालुओं ने कह दिया–सही करो। जो गलत नहीं करता मुक्त हो जाता है, और जो सही करता है वह भक्त है। जो गलत नहीं करता वह किसी को बुरा नहीं लगता, और जो सही करता है वह सबको प्यारा लगता है।

गलत नहीं करने में मनुष्य–मात्र स्वाधीन है; इसमें अन्य व्यक्ति तथा वस्तु की जरुरत नहीं होती। इसीलिए मुक्त होने में तो सभी स्वाधीन है। परंतु सही करने में किसी सबल का सहारा लेना पड़ता है, और सबल तो एक  प्रभु ही है।

इसलिए भक्त होने के लिए भगवान् का सहारा लेना पड़ता ही है। परंतु दोष और कामनाओं का त्याग तो दोनों को ही करना पड़ेगा। क्योंकि जब एक दोष और कामनायें रहेंगी, तब तक तो गलत ही करेगा। गलत करने वाला न तो मुक्त ही हो सकता है और न भक्त ही।

जो ‘स्व’ में संतुष्ट हो जाता है उसमें उदारता और प्रेम की स्वत: अभिव्यक्ति हो जाती है।  कारण, जब वह पराश्रय-युक्त अपने पूर्व जीवन को देखता है, तब दूसरों को भी पराश्रय से दु:खी देखकर करुणित हो उठता है और जब ‘स्व’ में संतुष्ट अपने वर्तमान जीवन को देखता है तो हमारा कोई रचयिता भी है­–इस बात की याद आते ही उसके हृदय में प्रेम का प्रादुर्भाव हो जाता है।

अतएव गलत मत करो और ठीक करने का फल मत चाहो, अभिमान मत करो और प्रभु का आश्रय ग्रहण करो। ॐ आनन्द !

योग क्या है?

योग एक दैवी वैधानिक शक्ति है। जीवन के प्रत्येक पहलू में योग अपेक्षित है। शरीर-विज्ञान, मनोविज्ञान, आध्यात्म-विज्ञान एवं आस्तिक-विज्ञान योग में निहित हैं। देहाभिमानी साधकों के लिए योग का बाह्य रूप जो शारीरिक हित के लिए है, अत्यन्त आवश्यक है; आर्थात् उत्कृष्ट भोग की प्राप्ति भी योग से ही साध्य है। और देहातीत जीवन के लिए तो योग परम आवश्यक है।

Swami Sharnanandjiशारीरिक क्रियाकलाप मात्र में ही योग को आबद्ध कर लेना योग की वास्तविकता से विमुख होना है। व्यक्तित्व को सुन्दर बनाना और उसके (व्यक्तित्व के) अभिमान से रहित होने के लिए भी योग अपेक्षित है। इतना ही नहीं, प्राकृतिक विधान के अनुसार सब प्रकार की शक्तियों का उद्गम भी योग है। बल, ज्ञान और प्रेम की प्राप्ति में भी योग ही हेतु है। परमात्मा से आत्मीय सम्बन्ध योग है। तत्वज्ञों का जातीय-सम्बन्ध योग है। योगियों का नित्य-सम्बन्ध योग है। अर्थात् शक्ति, मुक्ति, भक्ति, सभी के लिए योग अपेक्षित है।

अधिकतर लोग शरीर-विज्ञान और मनोविज्ञान की सीमा में ही योग को आबद्ध कर लेते हैं, जबकि योग का क्षेत्र कहीं अधिक विस्तृत है। राग की पूर्ति और निवृत्ति दोनों में ही योग हेतु है।

मानव-दर्शन पर आधारित मानव सेवा संघ की प्रणाली के अनुसार परिश्रम तथा पराश्रय से रहित होने पर सहज-भाव से नित्य योग की उपलब्धि होती है। नित्य योग में ही योग के समस्त अंगो का समावेश है। पर इस वास्तविकता को कोई बिरले ही अपना पाते हैं। शरीर और विश्व की सेवा में श्रम का स्थान है, किन्तु देहातीत, अविनाशी जीवन और अनन्त, नित्य, चिन्मय, रसरूप जीवन के लिए परिश्रम तथा पराश्रय का अत्यन्त अभाव अपेक्षित है।

योग के ‌‍‌अंग-

  • कर्मेन्द्रियों को ज्ञानेन्द्रियों में और ज्ञानेन्द्रियों को मन में विलीन कर बुद्धि को सम करना योग है।
  • दृष्टि बिना दृश्य के, चित्त बिना आधार के, और प्राण बिना निरोध के सम हो जाए, तो यह योग है।
  • योग साधक को पञ्च कोशों, तीनों अवस्थाओं तथा तीनों गुणों से असंग कर परम तत्व से अभिन्न करने में समर्थ है।
  • अल्पआहार, एकान्तवास, इन्द्रिय-निग्रह, और मौन – ये योग के बाह्य अंग हैं।
  • संसार से निराशा और निस्संकल्पता योग के आंतरिक अंग हैं।
  • श्रद्धापथ का साधक समर्पण से योग प्राप्त करता है।
  • विचार-पथ का साधक असंगता से योग प्राप्त करता है।

योग के चार पाद-

  • समाधि पाद- बुद्धि की समता,
  • साधन पाद- यम-नियमादि,
  • विभूति पाद- दिव्यता और अभिव्यक्ति; और
  • कैवल्य पाद- दृष्टा की स्वरूप में अवस्थिति।

स्वार्थ-भाव और सुख लोलुपता से रहित प्रवृत्ति योग है। विचारपूर्वक अहम् और मम् को गलाने वाली निवृत्ति योग है। आत्मीयता से जागृत अखण्ड-स्मृति योग है। जगत् और शरीर की एकता-कर्मयोग है। उदारता इसका साधन है। अहम् की अनन्त से अभिन्नता ज्ञान-योग है। विचार का उदय (बुद्धि की समता) – इसका साधन है। प्रीति और प्रेमास्पद की एकता भक्ति-योग है। आत्मीयता इसका साधन है। उदारता से कर्म-योग की, समता से ज्ञान-योग की तथा आत्मीयता से भक्ति-योग की सिद्धि होती है।

योग के साधन-

अभ्यास और वैराग्य योग के मुख्य साधन हैं। चित्त का सब ओर से हट जाना और अपने ही में अपने प्रेमास्पद को पाना अभ्यास है। संसार से सच्ची निराशा आ जाने पर जीवन में ही मृत्यु का अनुभव करना वैराग्य है। अभ्यास की प्रधानता और वैराग्य की न्यूनता के कारण योग का साधक भौतिक शक्तियों के समान मानसिक शक्तियों (विभिन्न सिद्धिओं) की उपलब्धि में अपने को आबद्ध कर लेता है और योग से विमुख हो जाता है।

योग के भेद- 

मन के निरोध से प्राण का सम होना- यह राजयोग है। और प्राण के निरोध द्वारा मन का निरोध करना- यह हठयोग कहलाता है। इस अभ्यास के द्वारा जो अवस्था- विशेष प्राप्त होती है, उसे भी योग कहते हैं। पर वह योग का बाह्य रूप है।

समस्त शक्तियों (सिद्धियों) का प्रादुर्भाव इसी अवस्था में होने लगता है; अर्थात् योग से आवश्यक सामर्थ्य की अभिव्यक्ति होती है। करने का राग साधक में शरीर के तादात्म्य को पोषित करता है। जो करना चाहिए उसके कर डालने पर, करने का राग निवृत्त हो जाता है। करने के राग का अन्त और योग की प्राप्ति युगपद है। मन की शक्तियों का विकास करने पर साधक के संकल्प पूरे होने लगते हैं। पर संकल्प-पूर्ति में इसका उपयोग करना योग नहीं, भोग है। संकल्प-शुद्धि से संकल्प-सिद्धि होती है, किन्तु संकल्प-पूर्ति का सुख साधक को निस्संक्ल्पता से प्राप्त नित्य-योग से विमुख करता है।

आध्यात्मवाद और आस्तिक-वाद से रहित योग एक भौतिक विज्ञान है। वास्तविक योग के विकास की परावधि बोध और प्रेम में है। इस कारण योग, बोध और प्रेम में विभाजन नहीं किया जा सकता। साधन-रूप योग (सेवा-त्याग) ही पूर्ण योग नहीं है, साध्यरूप योग (प्रेम) ही पूर्ण योग है।

TRUTH OF LIFE

The truth of life is what the wisdom (Gyana) proves or the faith reveals.

The wisdom proves that by any means, whatsoever it be, neither we can live forever with the body nor can the body remain with us forever.

The faith reveals that the one who is the illuminator and the source of creation is our own.

[su_highlight background=”#d3ff99″]At the root of entire creation there is an eternal being, who is also an illuminator of all appearance. If we accept the imperceptible it is called belief and if we accept the imperceptible it is called belief and if we accept his grace we call it reverence. Belief and reverence lead to implicit faith. Implicit faith makes intimate relationship vivacious and invokes ever lasting memory and unbounded love. Ever lasting memory and intense love are the essence of life. Which dispel all voidness.[/su_highlight]

Either accepts the truth which the wisdom reveals or accept the truth which is realized by belief, reverence and implicit faith.

[su_highlight background=”#99ffa3″]Wisdom tells us that no one should ever think ill of me, rather ever one should co-operate and have goodwill towards me. This signifies that whether any one has goodwill towards me and co-operates with me or not, I shall have goodwill for one and all and shall co-operate with them to the best of my ability.  Only such persons are called ‘Dharmatma’ (virtuous). This is the science of religion. Irrespective of one’s caste, creed, race or nationality or the strength one possesses, whether meager or abundant, the need for Dharmatma is felt by one and all.[/su_highlight]

If our own life becomes so sublime that our need is felt by all, but we may not feel the necessity of any one for our own self, such a life is termed generous and independent. True love manifests spontaneously in such a life.

Generosity, self dependence and love, all are immortal elements. According to the saying of the preceptors and the Veds, God is also supremely generous, independent and reservoir of eternal love. From this point of view human being and god are akin to each other and have eternal and intimate relationship. By accepting this truth, we attain such a divine life, where any kind of want, dependence, turbulence and voidness do not exit. Being a human being, should we not aspire for such a divine life? Whether the aspiration for such a life is fulfilled or not, we may not know or believing, but we are neither dependent on any one nor incapable of aspiring for such a life. Aspiration for such a life dispels all worldly desires and in its place Yoga (union with god) manifests spontaneously.

वर्तमान सभी का निर्दोष है

अपने को अथवा दूसरों को बुरा समझने का एकमात्र कारण भूतकाल की घटनाओं के आधार पर वर्तमान की निर्दोषता को आच्छादित कर देना है । क्योंकि कोई भी व्यक्ति सर्वांश में कभी भी बुरा नहीं होता और न सभी के लिए बुरा होता है । बुराई उत्पत्ति-विनाश-युक्त है, नित्य नहीं । जो नित्य नहीं है, उससे नित्य सम्बन्ध सम्भव नहीं है । ऐसी दशा में अपने को अथवा दूसरों को सदा के लिए बुरा मान लेना प्रमाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।

वर्तमान सभी का निर्दोष है, यह सभी का अनुभव है । जब हम अपने किसी भी दोष की चर्चा करते हैं, तब यह मानना ही पड़ता है कि वह दोष भूतकाल का है । वर्तमान में तो किए हुए दोष की स्मृति है, दोष-युक्त प्रवृत्ति नहीं। किसी प्रवृत्ति की स्मृति किसी का स्वरूप नहीं है । जो स्वरूप नहीं है, उसको अभेद भाव से अपने अथवा दूसरों में आरोप करना, क्या न्याययुक्त निर्णय है ? कदापि नहीं । अतः अपने को अथवा दूसरों को वर्तमान में बुरा समझना विवेक-विरोधी निर्णय है । इस निर्णय से अपने में अपराधी-भाव दृढ़ होता है और दूसरों के प्रति घृणा उत्पन्न होती है । अपराधी-भाव आरोपित कर, कोई भी निरपराध नहीं हो सकता; क्योंकि जैसा अहम् भाव होता है, वैसी ही प्रवृत्ति होती है । अहम् प्रवृत्ति का मूल है अथवा यों कहो कि कर्त्ता ही कर्म के रूप में व्यक्त होता है । इस दृष्टि से अशुद्ध कर्त्ता से शुद्ध कर्म की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है । शुद्ध कर्म शुद्ध कर्त्ता से ही होता है । कर्म की शुद्धि तभी हो सकती है, जब कर्त्ता शुद्ध हो जाए । अत: कर्म की शुद्धि के लिए कर्त्ता में शुद्धता की प्रतिष्ठा करना अनिवार्य है, जो वास्तव में विवेक-सिद्ध है ।

करने में सावधान और होने में प्रसन्न रहना

  • मानव जीवन में कार्यक्षमता ‘किसी’ कि दी हुई है, और ‘उसी’ ने विवेक का प्रकाश दिया है | अतः कार्यक्षमता का सदुपयोग बड़ी ही सावधानी से विवेक के प्रकाश में देखकर करना चाहिए |
  • प्रवृत्ति का सम्बन्ध समूह से है | सामूहिक सहयोग के बिना किसी भी कार्य का सम्पादन सम्भव नहीं है | समाज का प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने अपने कार्य को सावधानीपूर्वक करता रहे तो सहज ही सामाजिक अव्यवस्था मिट जाए और सारा समूह ही उन्नतिशील ही जाए |
  • जो कर्ता अपने लक्ष्य को जाने बिना कार्य में प्रवृत्त होता है उसकी प्रवृत्ति सावधानीपूर्वक नहीं होती है | वर्तमान को असावधानी कालान्तर में बहुत ही दुःखद फल उत्पन्न करने वाली बन जाती है | इससे मुक्त रहने के लिए कर्ता को वर्तमान में प्रत्येक प्रवृत्ति को करने में सावधान होना अनिवार्य है |
  • सही प्रवृति के फलस्वरूप कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति में सहज निवृत्ति कि शान्ति अभिव्यक्त होती है | अतः साधक के लिए प्रत्येक प्रवृत्ति को राग-निवृत्ति का साधन मानकर सावधानीपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये | राग-निवृत्ति कि शान्ति में ही योग, बोध व प्रेम की अभिव्यक्ति होती है, और इसी में जीवन की पूर्णता है |

सृष्टि में जो कुछ हो रहा है, वह सृष्टिकर्त्ता के विधान के अनुसार हो रहा है | इस तथ्य पर दृष्टि जाते ही ‘जो हो रहा है’ वह स्वाभाविक लगने लगता है, और मंगलमय प्रभु का विधान मानकर उसमें प्रसन्न रहने लगता है |  

TRUTH OF LIFE: PART-ONE

That which is the truth of your life is not the fruition of your travail, your laborious effort.  It is innately proffered to you. It is realized in awareness that nothing is mine, I don’t want anything whatever. That I don’t possess anything is a realization through awareness. And you have been endued with this awareness. Accordingly the truth that God is my own is realized in faith. You are already provided with this elemental essence of faith.

Similarly, the problem of world-peace is resolved by bringing strength of energy into beneficent services to the people; strength, energy is already granted to you. You are endowed with energy, wisdom and faith. This quintessential strength, wisdom and faith in your life is not the fruit of any of your special work done by diligence of self-effort.

Had it been the upshot of special effort, some skilled exertion, you could have constructed the machinery to produce and procure faith, awareness and capable strength. Nevertheless, it is a truth proved through experience that strength flourishes by prudent, beneficent use, freedom is attained by reverence for awareness and devotion to God is earned through abiding by faith in Him. Thus, the basic power of energy, strength, is gifted to you. Accordingly, intrinsic awareness and faith are granted to you. So that you should be useful to the world by the power of your given strength, energy. You may get release from the feeling of me-mine, desire and attachment and get liberated enlightened by innately given luminosity of awareness. The primordial faith gifted to you can be quickened enough to transform you into a soulful kinship with God to become His devotee.

Now, look! You have worked out the three life-projects on your own. Which are the schedules, the projects on the pith? You have decided not to misuse your energy or have decided to eschew the vanity of putting it to good use and renounce its consequent fruition. You have accomplished the sequence on Your own. You didn’t have to take help of the body for making your mind not to misuse your strength. You didn’t have to derive help from the world for its execution. You didn’t require the help of the body and the world for refusing to seek the result of the beneficent use of your energy or any boost to your ego for this abnegation.

Thus, that which is done by oneself in harmony with the truth of life is called Satsang. What else is Satsang? It is autonomous, self-reliant, independent fulfillment of responsibility. Satsang emanates from the intrinsic centre, the mode of being of man. Satsang is the Swadharm of man. As you awakened, eschewed misuse of energy; gave up the result and the vanity of putting it to good use, your attachment to the world was broken off. But look, your entanglement with the world is dismantled; you are not alienated from the world, it is not deserted or given up. Moreover, your being enmeshed in the world obstructed the sadhana, not the world itself. Our entanglement in the world is the obstruction in sadhana bringing it to inert standstill; the world itself is no hindrance on its own. Therefore, with the break-up of attachment to the world, whatever has been the barrier in sadhana is eliminated forever.

Source: Ascent Triconfluent by Brahmalīn Pujayapād Swāmī Sharnānandjī Mahārāj.

साधन युक्त जीवन ही मानव जीवन है

जीवन का निरीक्षण करने पर हम अपने को अन्य प्राणियों की तुलना में विवेकी तथा विश्वासी पाते हैं | साथ ही अपने में देह-जनित स्वभावों की अनेक आसक्तियों का समूह भी देखते हैं | उन आसक्ति-जनित निर्बलताओं से पीड़ित होकर ही हम उन्हें मिटाने के लिए विवेक के प्रकाश में विकल्प-रहित विश्वास के आधार पर जीवन को साधन-पारायण बनाने का यत्न करते हैं | उस साधनयुक्त जीवन को ही मानव-जीवन कहते हैं |

साधन-रहित जीवन मानव-जीवन नहीं है और साधनातीत जीवन भी मानव-जीवन नहीं है | साधन-रहित जीवन तो पशु-जीवन है और साधनातीत जीवन दिव्य, चिन्मय एवं पूर्ण जीवन है | दूसरे शब्दों में मानव-जीवन वह जीवन है जिसमें दिव्यता, चिन्मयता और पूर्णता की लालसा एवं देहजनित स्वभाव अर्थात् इन्द्रिय-जन्य आसक्ति रूपी निर्बलताएँ दोनों एक साथ विद्यमान हैं |

स्वाभाविक आवश्यकता की पूर्ति तथा अस्वाभाविक इच्छाओं की निवृत्ति करना ही मानव-जीवन का लक्ष्य है | दिव्यता, चिन्मयता, नित्यता एवं पूर्णता की प्राप्ति मानव की स्वाभाविक आवश्यकता है | इन्द्रिय-जन्य ज्ञान में सद्भाव होने से जो राग होता है, उससे प्रेरित होकर जिन इच्छाएँ हैं |

स्वाभाविक आवश्यकता उसी की होती है जिससे जातीय तथा स्वरूप की एकता हो | अस्वाभाविक इच्छा उसी की होती है, जिससे मानी हुई एकता और स्वरूप से भिन्नता हो | दिव्यता, चिन्मयता, नित्यता एवं पूर्णता हमें स्वभावतः प्रिय हैं, पर इन्द्रिय-जन्य विषयासक्ति ने उस स्वाभाविक आवश्यकता को ढक-सा लिया है और अस्वाभाविक इच्छाओं को उत्पन्न कर दिया है | इसके फलस्वरूप हम मानवता से विमुख होकर पशुता में प्रवृत्त तथा उसकी ओर अग्रसर होते हैं, जो वास्तव में प्रमाद है | अतः जिससे जातीय तथा स्वरूप की एकता है उसकी प्राप्ति और जिससे मानी हुई एकता एवं स्वरूप की भिन्नता है उसकी निवृत्ति करना ही मानव-जीवन का मुख्य उद्देश्य है |

यद्यपि “है” कभी अप्राप्त नहीं है, परन्तु “नहीं”, अर्थात् वस्तु आदि जिनसे केवल मानी हुई एकता है, उनकी आसक्ति से, जो वास्तव में प्राप्त है वह अप्राप्त जैसा प्रतीत होता है, और जो प्राप्त नहीं है, अर्थात् जिसकी प्राप्ति सम्भव ही नहीं है, वह प्राप्त-जैसा प्रतीत होता है | जब मानव निज विवेक के प्रकाश में अपने को “यह” से विमुख कर लेता है तब उसमें ‘है’ का योग, बोध तथा प्रेम स्वतः हो जाता है | बस, यही “है” की प्राप्ति है | इस प्रकार ‘है’ की प्राप्ति और ‘नहीं’ की निवृत्ति ही मानव जीवन की पूर्णता है |

The Importance of Calling 'He Nath!'.

‘My Lord’ this appeared in Udaipur. When I saw a sorrowful being or an aspirant, this (thought) appeared. ‘My Lord’ – You are mine so You are Dear. Do you know for whom is the term (Nath) ‘Lord’ used? For the One who is our Protector and capable.

The feelings that will come from ‘My Lord’ are of three types – (1) Dearness; (2) Care freeness; and (3) Fearlessness. You tell me, if any brother or sister achieves ‘Care freeness’ and ‘Fearlessness’ in their life, what higher life can be attained? But be aware, this care freeness and fearlessness can even be due to ignorance and/or shamelessness. The care freeness due to shamelessness does not have dearness but has the attraction for sensual pleasures. That is the reason why dearness is required before care freeness and fearlessness.

I tell people that if there is any worry in your mind, and if at that moment the words ‘My Lord’ comes to your lips, then believe me your worry will be destroyed. If at that moment you remember that you are not without a Protector, you have (are with) a Protector, then how can fear remain? Fear comes only in the lives of those who are without any Protector. The ones who have a Protector, how can any fear come in their lives? How can any apathy come in their lives? Why will he be tormented by any incapability? Only he will be tormented by incapability who does not have any Protector. Which incapability does a small child experience in His Mother’s lap?

There are no more beautiful words than ‘My Lord’ in our language.

‘हे नाथ’! पुकार की महिमा.

‘मेरे नाथ’ – इसका प्रादुर्भाव हुआ था उदयपुर में । एक दु:खी प्राणी या दु:खी साधक को देखकर यह उदित हुआ । ’मेरे नाथ’ – आप मेरे हैं, इसलिये प्यारे है । ‘नाथ’ पद का प्रयोग मालूम है किसके लिये किया जाता है? जो रक्षक हो और समर्थ हो ।

‘मेरे नाथ’ वाक्य से जो बोधार्थ नि:सृत होगा, उसके तीन रूप होंगे – प्रियता, निश्चिन्तता और निर्भयता । यदि किसी भाई या बहिन के जीवन में निश्चिन्तता और निर्भयता है तो आप ही बताइये, इससे ऊँचा जीवन और क्या हो सकता है? परन्तु ध्यान रहे, यह निश्चिन्तता और निर्भयता नासमझी से भी होती है, और बेशर्माई से भी होती है । बेशर्माई से जो होती है, उसमें प्रियता नहीं होती, उसमें सुखासक्ति होती है । इसलिये निश्चिन्तता और निर्भयता से पहले प्रियता अपेक्षित है ।

मैं तो लोगो से कहता हूँ कि यदि तुम्हारे दिल में घबराहट हो और उस घड़ी कहीं तुम्हारे लबपर आ जाय – ‘मेरे नाथ !’ तो आप सच मानिये, आपकी घबराहट नाश हो जायगी । उस क्षण यदि आपको याद आ जाय कि आप अनाथ नहीं, सनाथ हैं तो भय कैसे निवास करेगा? भय तो अनाथ के जीवन में निवास करता है । जो सनाथ है, उसके जीवन में भय कहाँ से आयेगा? उसके जीवन में नीरसता कहाँ से आयेगी? वह असमर्थता से पीड़ित क्यों होगा? असमर्थता से पीड़ित वही होगा, जो अनाथ है । नन्हा-सा बालक अपनी माँ की गोद में क्या असमर्थता का अनुभव करता है? (जीवन दर्शन)

‘मेरे नाथ’ से सुन्दर शब्द अपनी भाषा में नहीं हैं । (प्रेरणा पथ-पेज-१६५)

‘मेरे नाथ’-इस वाक्यका उच्चारण करते ही ऐसा हृदयमें भास होता है कि हम अनाथ नहीं हैं, कोई हमारा अपना है। और जो हमारा अपना है, वह कैसा है? वह समर्थ है और रक्षक है। अब आप सोचिये कि समर्थ और रक्षकके होते हुए हमारे और आपके जीवनमें चिन्ता और भयका कोई स्थान ही नहीं रहता।(संतवाणी-८-पेज-३५)

मानवता में ही पूर्णता निहित है.

मानवता मानवमात्र में बीजरूप में विद्यमान है | उसे विकिसित करने की स्वाधीनता अनन्त के मंगलमय विधान से सभी को प्राप्त है | मानवता किसी परिस्थिति-विशेष की ही वास्तु नहीं है | उसकी उपलब्धि सभी परिस्थितियों में हो सकती है | उसकी माँग अपने लिए, जगत के लिए एवं अनन्त के लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि मानवता में ही पूर्णता निहित है |

विवेक-विरोधी कर्म का त्याग, अर्थात् कर्त्तव्य-परायणता, विवेक-विरोधी सम्बन्ध का त्याग, अर्थात् असंगता और विवेक-विरोधी विश्वास का त्याग, अर्थात् उसमें अविचल श्रद्धा जो इन्द्रिय-ज्ञान तथा बुद्धि-ज्ञान का विषय नहीं है-यही मानवता का चित्र है | कर्त्तव्य-परायणता आ जाने से मानव-जीवन जगत् के लिए, असंगता प्राप्त होने से जीवन अपने लिए और अविचल श्रद्धापूर्वक आत्मीयता स्वीकार करने से जीवन अनन्त के उपोगी सिद्ध होता है | इस दृष्टि  से यह निर्विवाद है की मानवता सभी की माँग है |

यह सभी को मान्य होगा कि विवेकयुक्त जीवन ही मानव-जीवन है | इस कारण विद्यमान मानवता को विकसित करने के लिए विवेक-विरोधी कर्म, सम्बन्ध तथा विश्वास का त्याग करना अनिवार्य है | उसे बिना किये अमानवता का अन्त हो ही नहीं सकता | अमानव को पशु कहना पशु की निन्दा है, क्योंकि अमानवता पशुता से भी बहुत नीची है और मानव को देवता कहना मानव की निन्दा है, क्योंकि मानवतायुक्त मानव देवता से बहुत ऊँचा है, अथवा यों कहो कि मानवता देवत्व से बहुत ऊँची है और अमानवता पशुता से बहुत नीची | इस दृष्टि से अमानवता का मानव-जीवन में कोई स्थान नहीं है | अमानवता के नाश में ही मानवता निहित है |

निज विवेक के आदर में ही अमानवता का अन्त है | अतः विद्यमान मानवता को विकसित करने में प्रत्येक वर्ग, समाज और देश का व्यक्ति सर्वदा स्वाधीन है | मानवता किसी मत, सम्प्रदाय तथा वाद विशेष की ही वास्तु नहीं है, अपितु वह सभी को सफलता प्रदान करने वाली अनुपम विभूति है | कर्त्तव्यपरायणता, असंगता एवं आत्मीयता मानवता के बाह्यचित्र हैं और योग, बोध तथा प्रेम मानवता का अन्तरंग स्वरुप है | योग में सामर्थ्य, बोध में अमरत्व और प्रेम में अनन्त रस निहित है | सामर्थ्य, बोध, अमरत्व और अनन्त रस की माँग ही मानव की माँग है | इस दृष्टि से मानवता में ही पूर्णता निहित है |