प्रश्न- मानव-सेवा-संघ का उद्देश्य क्या है?

उत्तर- मानव-सेवा-संघ का उद्देश्य मानव का अपना कल्याण और सुन्दर समाज का निर्माण है। अपने कल्याण का अर्थ है, अपनी प्रसन्नता के लिए ‘पर’ की आवश्यकता न रहे। सुन्दर समाज के निर्माण का अर्थ है कि ऐसे समाज का निर्माण, जिसमें सभी के अधिकार सुरक्षित हों, किसी के अधिकार का अपहरण न होता हो। इस उद्देश्य कि पूर्ति दूसरों के अधिकार की रक्षा और अपने अधिकार के त्याग से होती है। दूसरों के अधिकार की रक्षा करने से सुन्दर समाज का निर्माण और विद्यमान राग की निवृत्ति होती है, और अपने अधिकार के त्याग से नवीन राग की उत्पत्ति नहीं होती है।

‘प्रश्नोत्तरी’ संतवाणी पुस्तक से, पृष्ठ- संख्या- 34, मानव सेवा संघ, वृन्दावन

स्वामी श्री शरणानन्द जी महाराज

प्रश्न- भगवान्‌ हमसे प्रेम करते हैं, यह कैसे मालूम हो? 

उत्तर- भगवान्‌ पर विश्वास हो और उनसे हमारा सम्बन्ध हो तब मालूम हो सकता है। जैसे माता अपने बच्चे के लिए तरसती है, वैसे ही भगवान्‌ अपने भक्त के लिए तरसते हैं। बच्चा काला-कलूटा, गूँगा-बहरा, लूला-लँगड़ा कैसा भी हो, माता उससे प्रेम करती है। बच्चा भी यह बात समझता है। भगवान्‌ में तो माता से अनेक गुना वात्सल्य है। फिर वे भक्त से प्रेम करें, इसमें कहना ही क्या ।

अत: जो एकमात्र भगवान्‌ को ही मानते हैं, उनको भगवान्‌ का प्रेम मिलता है। इसमें सन्देह नहीं है। यह भक्तों का अनुभव है। ईश्वर प्रेमीभक्त को ढूँढ़ता है। विचारशील साधक ईश्वर को ढूँढ़ता है।

प्रश्न- मुझे साधन करते हुए एक अर्सा हो गया, किन्तु अभी तक सफलता के दर्शन नहीं हुए, क्या कारण है।

उत्तर- जो मनुष्य असाधन को बनाए रखकर साधन करते हैं, उनको बहुत दिनों तक साधन करने पर भी वर्तमान में सिद्धि नहीं मिल सकती। 

जो मनुष्य वस्तु और व्यक्ति का आश्रय लेकर साधन करना चाहते हैं, उनको भी सफलता नहीं मिलती। इसलिए भगवान्‌ का आश्रय लेकर साधन करो, सफलता अवश्य मिलेगी। 

जो साधक देशकाल, परिस्थिति, वस्तु व व्यक्ति का आश्रय छोड़ कर साधन करता है, उसको शीघ्र सफलता मिलती है। 

‘स्व’ में सन्तुष्ट रहो, मानवता को महत्व दो और प्रभु पर विश्वास करो-यही साधना है और इसी का नाम जीवन है। जिसके जीवन में यह बातें आ जाती हैं, उसको सफलता अवश्य मिलती है।

प्रश्न- सच्चा सुख मनुष्य को कब और कैसे मिल सकता है।

उत्तर- वास्तव में मानव-जीवन की यही सबसे बड़ी समस्या है । इसके हल करने में प्राणी सदा स्वतन्त्र है । इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार न करना बड़ी भारी भूल है । 

मानवता प्राप्त होने पर मनुष्य मानवता प्राप्त होने पर मनुष्य को वह सुख मिल जाता है जिसमें दु:ख नहीं होता अर्थात्‌ सच्चा सुख मिल जाता है । 

सहज भाव से मूक भाषा में प्रेम पात्र से प्रार्थना करो–“हे नाथ ! इस हृदय को अपनी प्रीति से भर दो । इस शरीर को दु:खियों की सेवा में लगा दो । बुद्धि को विवेकवती बना दो । इस जगत्‌ रुपी वाटिका में मुझे एक सुन्दर पुष्प बना दो । मैं सदा आपकी कृपा की प्रतीक्षा में रहूँ ।” ऐसी प्रार्थना करने से प्रेम-पात्र तुम्हें अपनी सेवा करने के योग्य अवश्य बना लेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है ।

प्रश्न- कभी तो ऐसा मालूम होता है कि हॄदय में प्रेम है और कभी ऐसा मालूम होता है कि हॄदय सूना-सा है, प्रेम नहीं है। यह क्या है?

उत्तर- स्वयं साक्षी बनकर मनके गुण-दोषों को देखना, विश्वास और प्रेम का बार-बार निरीक्षण करना, यह प्रेममार्ग की साधना नहीं है। साक्षी-भाव से यह देखना कि गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं, यह तो विचारमार्ग की साधना है। विश्वास और प्रेम की खोज करना तो वैसी ही गलती है जैसे कोई बीज बोकर उसे खोद-खोदकर देखे कि यह उपजा या नहीं। अत: साधक को चाहिये कि प्रभु को अपना समझे, उनपर दृढ़-विश्वास करे, विश्वास में विकल्प न आने दे। शरीर, मन, इन्द्रियों और बुद्धिको तथा अपने-आपको पूर्णतया भगवान्‌ के समर्पण करके सब प्रकार से उनपर निर्भर हो जाय।

आश्चर्य की बात तो यह है कि मनुष्य संसारपर जितना भरोसा करता है, उतना भगवान्‌ पर नहीं करता। जैसे कहीं जानेवाला मुसाफिर पहले से सीट रिजर्व करा लेता है, तो उसको यह भरोसा रहता है कि ठीक समय पर पर सीट जरुर मिल जायगी। अत: वह निश्चिन्त हो जाता है, यद्द्यपि उसमें अनेकों विघ्न भी आ सकते हैं। विघ्न असम्भव नहीं है, तो भी उसपर भरोसा कर लेता है। संसारपर भरोसा करके बहुत बार धोखा खाया है एवं भगवान्‌ पर भरोसा करनेवाले को कभी धोखा नहीं हुआ। यह मानते हुए भी मनुष्य भगवान्‌ पर निर्भर नहीं होता, इससे बढ़कर दु:ख और आश्चर्य क्या होगा?

मनुष्य स्वयं अलग रहकर अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको भगवान्‌ में लगाना चाहता है, यहाँसे ही गलती होती है। प्रेमका सम्बन्ध साधकसे है न कि उसके मन, इन्द्रिय और बुद्धिसे। प्रेममार्ग में चलनेवाला पहले तो अपनेको अपने प्रियतम के प्रेमकी लालसा और बादमें प्रेम समझता है, प्रेमी प्रेममें विलीन हो जाता है। प्रेम और प्रेमीमें भिन्नता नहीं रहती। अत: प्रेम मार्ग के साधक के जीवनमें भगवान्‌ का प्रेम, भरोसा और कृपा सदा सजीव बने रहने चाहिये, भावकी शिथिलता नहीं होनी चाहिये।