गलत नहीं करने में मनुष्य मात्र स्वाधीन है

नापसन्द करने से नाशवान् की विस्मृति  होगी–यह साधन हुआ; और पसंद करने से अविनाशी की स्मृति जगेगी, लालसा जगेगी–यह भजन हो गया। विचारकों ने कहा–गलत मत करो और श्रद्धालुओं ने कह दिया–सही करो। जो गलत नहीं करता मुक्त हो जाता है, और जो सही करता है वह भक्त है। जो गलत नहीं करता वह किसी को बुरा नहीं लगता, और जो सही करता है वह सबको प्यारा लगता है।

गलत नहीं करने में मनुष्य–मात्र स्वाधीन है; इसमें अन्य व्यक्ति तथा वस्तु की जरुरत नहीं होती। इसीलिए मुक्त होने में तो सभी स्वाधीन है। परंतु सही करने में किसी सबल का सहारा लेना पड़ता है, और सबल तो एक  प्रभु ही है।

इसलिए भक्त होने के लिए भगवान् का सहारा लेना पड़ता ही है। परंतु दोष और कामनाओं का त्याग तो दोनों को ही करना पड़ेगा। क्योंकि जब एक दोष और कामनायें रहेंगी, तब तक तो गलत ही करेगा। गलत करने वाला न तो मुक्त ही हो सकता है और न भक्त ही।

जो ‘स्व’ में संतुष्ट हो जाता है उसमें उदारता और प्रेम की स्वत: अभिव्यक्ति हो जाती है।  कारण, जब वह पराश्रय-युक्त अपने पूर्व जीवन को देखता है, तब दूसरों को भी पराश्रय से दु:खी देखकर करुणित हो उठता है और जब ‘स्व’ में संतुष्ट अपने वर्तमान जीवन को देखता है तो हमारा कोई रचयिता भी है­–इस बात की याद आते ही उसके हृदय में प्रेम का प्रादुर्भाव हो जाता है।

अतएव गलत मत करो और ठीक करने का फल मत चाहो, अभिमान मत करो और प्रभु का आश्रय ग्रहण करो। ॐ आनन्द !

संघ प्राकट्य एवं संत निर्वाण दिवस

संघ–प्राकट्य एवं संत निर्वाण दिवस दिनाकं २१ दिसम्बर २०१५ (मोक्षदा एकादशी एवं गीता जयंती) के पुण्य–पर्व पर मानव सेवा संघ के केन्द्रीय आश्रम–वृन्दावन में उत्साह एवं श्रद्धापूर्वक मनाया गया। प्रातः ८.३० बजे सभी आगन्तुक भक्तवृंद एवं आश्रमवासी साधक भाई–बहनों ने संघ के संस्थापक की महासमाधि स्थल पर एकत्रित होकर उन्हें भावभीनी पुष्पार्चित श्रद्धांजलि अर्पित की। संघ की प्रार्थना एवं हरिः शरणम् के बाद सर्वप्रथम झण्डा गायन हुआ–‘सेवा-त्याग-प्रेम का झण्डा ऊँचा सदा रहेगा’। तत्पश्चात् ‘प्रार्थना एवं पद’ पुस्तिका से कुछ पदों का उपस्थित जनसमुदाय ने भावविभोर होकर समवेत स्वर में गायन किया। अन्त में सर्वहितकारी कीर्तन- ‘हे हृदयेश्वर हे सर्वेश्वर’ के साथ समेकित साधकों ने समाधी स्थल की परिक्रमा की तथा संघ के नारे– ‘त्याग–प्रेम की जय हो–रोग द्वेष का नाश हो’ का जयघोष किया।

तत्पश्चात् सभी साधकवृन्द ‘सन्त कुटी’ में एकत्रित हुए। जहाँ भक्तों ने ब्रह्मलीन सन्त के पाद–पझों में गुरु–महिमा को लेकर भक्ति–पूर्ण रचनायें प्रस्तुत कीं। उससे उपरान्त श्रीमद्भगवद् गीता के द्वादश अध्याय का सामूहिक वाचन हुआ। कुछ देर ‘टेपांकित संतवाणी’ के श्रवण के उपरांत स्वामी अद्वैत चैतन्य जी एवं साध्वी अर्पिता जी ने मानव सेवा संघ के उद्दे‌‍शय पर प्रकाश डाला एवं संघ के प्रवर्तक के कुछ मार्मिक प्रसंगों का उल्लेख किया।

तत्पश्चात् सभी आगन्तुक महानुभाव एवं आश्रमवासी साधक भाई–बहन गौशाला के मुख्य द्वार पर गौपूजन हेतु एकत्रित हुए। जिसमें गायों को रोली–चन्दन–अक्षत लगाकर माला पहनाई गई एवं उन्हें गुड़ खिलाकर आरती उतारी गई। अन्त में प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

दोपहर एक बजे आश्रम की भोजनशाला में एक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें सभी उपस्थित प्रेमीजनों ने प्रसाद ग्रहण किया।

प्रश्न- मानव-सेवा-संघ का उद्देश्य क्या है?

उत्तर- मानव-सेवा-संघ का उद्देश्य मानव का अपना कल्याण और सुन्दर समाज का निर्माण है। अपने कल्याण का अर्थ है, अपनी प्रसन्नता के लिए ‘पर’ की आवश्यकता न रहे। सुन्दर समाज के निर्माण का अर्थ है कि ऐसे समाज का निर्माण, जिसमें सभी के अधिकार सुरक्षित हों, किसी के अधिकार का अपहरण न होता हो। इस उद्देश्य कि पूर्ति दूसरों के अधिकार की रक्षा और अपने अधिकार के त्याग से होती है। दूसरों के अधिकार की रक्षा करने से सुन्दर समाज का निर्माण और विद्यमान राग की निवृत्ति होती है, और अपने अधिकार के त्याग से नवीन राग की उत्पत्ति नहीं होती है।

‘प्रश्नोत्तरी’ संतवाणी पुस्तक से, पृष्ठ- संख्या- 34, मानव सेवा संघ, वृन्दावन

स्वामी श्री शरणानन्द जी महाराज

योग क्या है?

योग एक दैवी वैधानिक शक्ति है। जीवन के प्रत्येक पहलू में योग अपेक्षित है। शरीर-विज्ञान, मनोविज्ञान, आध्यात्म-विज्ञान एवं आस्तिक-विज्ञान योग में निहित हैं। देहाभिमानी साधकों के लिए योग का बाह्य रूप जो शारीरिक हित के लिए है, अत्यन्त आवश्यक है; आर्थात् उत्कृष्ट भोग की प्राप्ति भी योग से ही साध्य है। और देहातीत जीवन के लिए तो योग परम आवश्यक है।

Swami Sharnanandjiशारीरिक क्रियाकलाप मात्र में ही योग को आबद्ध कर लेना योग की वास्तविकता से विमुख होना है। व्यक्तित्व को सुन्दर बनाना और उसके (व्यक्तित्व के) अभिमान से रहित होने के लिए भी योग अपेक्षित है। इतना ही नहीं, प्राकृतिक विधान के अनुसार सब प्रकार की शक्तियों का उद्गम भी योग है। बल, ज्ञान और प्रेम की प्राप्ति में भी योग ही हेतु है। परमात्मा से आत्मीय सम्बन्ध योग है। तत्वज्ञों का जातीय-सम्बन्ध योग है। योगियों का नित्य-सम्बन्ध योग है। अर्थात् शक्ति, मुक्ति, भक्ति, सभी के लिए योग अपेक्षित है।

अधिकतर लोग शरीर-विज्ञान और मनोविज्ञान की सीमा में ही योग को आबद्ध कर लेते हैं, जबकि योग का क्षेत्र कहीं अधिक विस्तृत है। राग की पूर्ति और निवृत्ति दोनों में ही योग हेतु है।

मानव-दर्शन पर आधारित मानव सेवा संघ की प्रणाली के अनुसार परिश्रम तथा पराश्रय से रहित होने पर सहज-भाव से नित्य योग की उपलब्धि होती है। नित्य योग में ही योग के समस्त अंगो का समावेश है। पर इस वास्तविकता को कोई बिरले ही अपना पाते हैं। शरीर और विश्व की सेवा में श्रम का स्थान है, किन्तु देहातीत, अविनाशी जीवन और अनन्त, नित्य, चिन्मय, रसरूप जीवन के लिए परिश्रम तथा पराश्रय का अत्यन्त अभाव अपेक्षित है।

योग के ‌‍‌अंग-

  • कर्मेन्द्रियों को ज्ञानेन्द्रियों में और ज्ञानेन्द्रियों को मन में विलीन कर बुद्धि को सम करना योग है।
  • दृष्टि बिना दृश्य के, चित्त बिना आधार के, और प्राण बिना निरोध के सम हो जाए, तो यह योग है।
  • योग साधक को पञ्च कोशों, तीनों अवस्थाओं तथा तीनों गुणों से असंग कर परम तत्व से अभिन्न करने में समर्थ है।
  • अल्पआहार, एकान्तवास, इन्द्रिय-निग्रह, और मौन – ये योग के बाह्य अंग हैं।
  • संसार से निराशा और निस्संकल्पता योग के आंतरिक अंग हैं।
  • श्रद्धापथ का साधक समर्पण से योग प्राप्त करता है।
  • विचार-पथ का साधक असंगता से योग प्राप्त करता है।

योग के चार पाद-

  • समाधि पाद- बुद्धि की समता,
  • साधन पाद- यम-नियमादि,
  • विभूति पाद- दिव्यता और अभिव्यक्ति; और
  • कैवल्य पाद- दृष्टा की स्वरूप में अवस्थिति।

स्वार्थ-भाव और सुख लोलुपता से रहित प्रवृत्ति योग है। विचारपूर्वक अहम् और मम् को गलाने वाली निवृत्ति योग है। आत्मीयता से जागृत अखण्ड-स्मृति योग है। जगत् और शरीर की एकता-कर्मयोग है। उदारता इसका साधन है। अहम् की अनन्त से अभिन्नता ज्ञान-योग है। विचार का उदय (बुद्धि की समता) – इसका साधन है। प्रीति और प्रेमास्पद की एकता भक्ति-योग है। आत्मीयता इसका साधन है। उदारता से कर्म-योग की, समता से ज्ञान-योग की तथा आत्मीयता से भक्ति-योग की सिद्धि होती है।

योग के साधन-

अभ्यास और वैराग्य योग के मुख्य साधन हैं। चित्त का सब ओर से हट जाना और अपने ही में अपने प्रेमास्पद को पाना अभ्यास है। संसार से सच्ची निराशा आ जाने पर जीवन में ही मृत्यु का अनुभव करना वैराग्य है। अभ्यास की प्रधानता और वैराग्य की न्यूनता के कारण योग का साधक भौतिक शक्तियों के समान मानसिक शक्तियों (विभिन्न सिद्धिओं) की उपलब्धि में अपने को आबद्ध कर लेता है और योग से विमुख हो जाता है।

योग के भेद- 

मन के निरोध से प्राण का सम होना- यह राजयोग है। और प्राण के निरोध द्वारा मन का निरोध करना- यह हठयोग कहलाता है। इस अभ्यास के द्वारा जो अवस्था- विशेष प्राप्त होती है, उसे भी योग कहते हैं। पर वह योग का बाह्य रूप है।

समस्त शक्तियों (सिद्धियों) का प्रादुर्भाव इसी अवस्था में होने लगता है; अर्थात् योग से आवश्यक सामर्थ्य की अभिव्यक्ति होती है। करने का राग साधक में शरीर के तादात्म्य को पोषित करता है। जो करना चाहिए उसके कर डालने पर, करने का राग निवृत्त हो जाता है। करने के राग का अन्त और योग की प्राप्ति युगपद है। मन की शक्तियों का विकास करने पर साधक के संकल्प पूरे होने लगते हैं। पर संकल्प-पूर्ति में इसका उपयोग करना योग नहीं, भोग है। संकल्प-शुद्धि से संकल्प-सिद्धि होती है, किन्तु संकल्प-पूर्ति का सुख साधक को निस्संक्ल्पता से प्राप्त नित्य-योग से विमुख करता है।

आध्यात्मवाद और आस्तिक-वाद से रहित योग एक भौतिक विज्ञान है। वास्तविक योग के विकास की परावधि बोध और प्रेम में है। इस कारण योग, बोध और प्रेम में विभाजन नहीं किया जा सकता। साधन-रूप योग (सेवा-त्याग) ही पूर्ण योग नहीं है, साध्यरूप योग (प्रेम) ही पूर्ण योग है।

TRUTH OF LIFE

The truth of life is what the wisdom (Gyana) proves or the faith reveals.

The wisdom proves that by any means, whatsoever it be, neither we can live forever with the body nor can the body remain with us forever.

The faith reveals that the one who is the illuminator and the source of creation is our own.

[su_highlight background=”#d3ff99″]At the root of entire creation there is an eternal being, who is also an illuminator of all appearance. If we accept the imperceptible it is called belief and if we accept the imperceptible it is called belief and if we accept his grace we call it reverence. Belief and reverence lead to implicit faith. Implicit faith makes intimate relationship vivacious and invokes ever lasting memory and unbounded love. Ever lasting memory and intense love are the essence of life. Which dispel all voidness.[/su_highlight]

Either accepts the truth which the wisdom reveals or accept the truth which is realized by belief, reverence and implicit faith.

[su_highlight background=”#99ffa3″]Wisdom tells us that no one should ever think ill of me, rather ever one should co-operate and have goodwill towards me. This signifies that whether any one has goodwill towards me and co-operates with me or not, I shall have goodwill for one and all and shall co-operate with them to the best of my ability.  Only such persons are called ‘Dharmatma’ (virtuous). This is the science of religion. Irrespective of one’s caste, creed, race or nationality or the strength one possesses, whether meager or abundant, the need for Dharmatma is felt by one and all.[/su_highlight]

If our own life becomes so sublime that our need is felt by all, but we may not feel the necessity of any one for our own self, such a life is termed generous and independent. True love manifests spontaneously in such a life.

Generosity, self dependence and love, all are immortal elements. According to the saying of the preceptors and the Veds, God is also supremely generous, independent and reservoir of eternal love. From this point of view human being and god are akin to each other and have eternal and intimate relationship. By accepting this truth, we attain such a divine life, where any kind of want, dependence, turbulence and voidness do not exit. Being a human being, should we not aspire for such a divine life? Whether the aspiration for such a life is fulfilled or not, we may not know or believing, but we are neither dependent on any one nor incapable of aspiring for such a life. Aspiration for such a life dispels all worldly desires and in its place Yoga (union with god) manifests spontaneously.

वर्तमान सभी का निर्दोष है

अपने को अथवा दूसरों को बुरा समझने का एकमात्र कारण भूतकाल की घटनाओं के आधार पर वर्तमान की निर्दोषता को आच्छादित कर देना है । क्योंकि कोई भी व्यक्ति सर्वांश में कभी भी बुरा नहीं होता और न सभी के लिए बुरा होता है । बुराई उत्पत्ति-विनाश-युक्त है, नित्य नहीं । जो नित्य नहीं है, उससे नित्य सम्बन्ध सम्भव नहीं है । ऐसी दशा में अपने को अथवा दूसरों को सदा के लिए बुरा मान लेना प्रमाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।

वर्तमान सभी का निर्दोष है, यह सभी का अनुभव है । जब हम अपने किसी भी दोष की चर्चा करते हैं, तब यह मानना ही पड़ता है कि वह दोष भूतकाल का है । वर्तमान में तो किए हुए दोष की स्मृति है, दोष-युक्त प्रवृत्ति नहीं। किसी प्रवृत्ति की स्मृति किसी का स्वरूप नहीं है । जो स्वरूप नहीं है, उसको अभेद भाव से अपने अथवा दूसरों में आरोप करना, क्या न्याययुक्त निर्णय है ? कदापि नहीं । अतः अपने को अथवा दूसरों को वर्तमान में बुरा समझना विवेक-विरोधी निर्णय है । इस निर्णय से अपने में अपराधी-भाव दृढ़ होता है और दूसरों के प्रति घृणा उत्पन्न होती है । अपराधी-भाव आरोपित कर, कोई भी निरपराध नहीं हो सकता; क्योंकि जैसा अहम् भाव होता है, वैसी ही प्रवृत्ति होती है । अहम् प्रवृत्ति का मूल है अथवा यों कहो कि कर्त्ता ही कर्म के रूप में व्यक्त होता है । इस दृष्टि से अशुद्ध कर्त्ता से शुद्ध कर्म की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है । शुद्ध कर्म शुद्ध कर्त्ता से ही होता है । कर्म की शुद्धि तभी हो सकती है, जब कर्त्ता शुद्ध हो जाए । अत: कर्म की शुद्धि के लिए कर्त्ता में शुद्धता की प्रतिष्ठा करना अनिवार्य है, जो वास्तव में विवेक-सिद्ध है ।

Dr. G.N. Saxena and Dr. Arvind Sharma join as Advisors to SEAIT.

South East Asia Institute for Thalassemia (SEAIT) is a joint collaboration of Manav Sewa Sangh, Prem Niketan Hospital, Jaipur, India and Cure 2 Children Foundation, Florence, Italy, for the screening, detection and diagnosis of Thalassemia and blood disorders including blood cancer.

SEAIT is committed to provide world class healthcare and treatment to the thalassemia patients by a team of highly qualified doctors, dedicated nurses, para-medical and non-medical staff with the help of state-of-the-art diagnostics, therapeutic services in a comfortable, caring and safe environment at an affordable cost. With the passage of time, SEAIT has enhanced its infrastructure and also services of expertise.

As an addition, we mi1_1283are pleased to state that now guidance of one of most experienced doctors would be available to the centre. Dr G.N Saxena has joined as an advisor SEAIT, after retiring as Head of Department, Medicine, S.M.S Medical College and Hospital, Jaipur in September 2012. He is presently Dean, Telemedicine & Professor, Department of Medicine, Mahatma Gandhi University of Medical Sciences, Jaipur.

Not only this, as an International Advisor, services of Dr. Arvind Sharma would now also be available at the centre. Dr. Sharma is FRACP(Australia), MD, MRCP(UK); MRCPCH(UK) Sr. Consultant Pediatrician, Govt. of Western Australia; Sr. Lecturer, Faculty of Medicine, University of Western Australia and School of Medicine, University of Notre Dame Fremantle, Perth Australia.

We are well assured that with the significant contribution of Dr. G.N. Saxena and Dr. Arvind, SEAIT would be acknowledged as one of the best and sophisticated internationally acclaimed BMT Centre.

Source: http://www.seaitindia.org/blog/Advisors.html

Rajasthan Government recognized SEAIT as an authorized centre for BMT.

Rajasthan State Government after providing free medical facilities including free iron chelation medicines and blood tests for thalassemia major patients has now, a step ahead issued order on 17th April, 2013 authorizing SEAIT as an authorized hospital for treatment of such patients.

South East Asia Institute for Thalassemia (SEAIT) is a joint collaboration of Manav Sewa Sangh, Prem Niketan Hospital, Jaipur,India and Cure 2 Children Foundation, Florence, Italy, for the screening, detection and diagnosis of Thalassemia and blood disorders including blood cancer. SEAIT is a centre committed to the cure of children with severe blood disorders in particular,transfusion dependent thalassemia by bone marrow transplantation.

Low Income Category non BPL thalassemia major patients, whose annual family income is upto Rs. 2.50 lacs, can now undergo treatment at SEAIT. For Bone Marrow Transplant of thalassemia major patients, financial support would be provided from Rajasthan Chief Minister Relief Fund. SEAIT the only BMT Centre working in Rajasthan for the eradication of thalassemia, after due recognizition from the State Govt. will now be able to perform transplants of low income group thalassemics.

For BMT lacs of funds are required and only financially sound patients were able to go for it. This effort of State Govt. has enlightened the way of living full and healthy life to such BPL patients also who could have never thought of the treatment. This has shown how empathetic and caring the State Govt. is towards thalassemia major patients.

Approval by Govt. of Rajasthan as an authorized centre along with financial aid will go a long way in fulfilling the mission and vision of the hospital to serve the Thalassemics as a nonpolitical, secular nonprofit organization.

SEAIT and thalassemia patients express heartfelt gratitude to Hon’ble Chief Minister of Rajasthan Sh. Ashok Gehlotji and State Government for this support.

Source: http://www.seaitindia.org/blog/authorized.html

Prem Niketan Ashram: From Humanism to Social service.

Dr Nita Mukherjee narrates how an ashram has put its philosophy to work. 

1358574604_niketan-ashramPrem Niketan (‘abode of love’) is the story of the transformation of an ashram deeply rooted in propagating humanism to an organisation providing a range of social services. At the core of Prem Niketan (PN) is the philosophy that goodness is embodied in the human heart; it needs to be stoked with ethical practice. Chanderbala Parnami, its president since 1999, emphasises strongly that PN is not a ‘religious organisation’; she asserts that Manav Sewa Sangh (of which PN is an affiliate) represents a philosophy of life—of realising goodness through doing good.

Prem Niketan Ashram, founded by Maharaj Sharananandji, was registered under the Society’s Act in FY1953-54. Today, it runs four social service institutions under its aegis. These are: Prem Niketan Hospital (PNH), Prem Niketan Secondary School (PNSS), Geriatric-cum-nursing Care Centre (GCC) and Shubh Shanti Niwas (SSN, an old age home).

PNSS caters mainly to the children of labour class from the surrounding areas. To encourage these first-generation students, PNSS provides free conveyance from the bastis; 50% students are given free education. Others pay nominal charges and PNSS organises donations of study materials and mid-day meals; even the science lab and the computer centre have been set up with donations. Asha Tak, director, STInfosys, a volunteer for PN since 2006, focuses on PNSS. She says, “Running a school with 500 students without government aid is credible when you see the facilities and performance of the students.” Many students are sponsored. Annual sponsorship per child varies from Rs3,500/- for 1st to 5th standard up to Rs6,000/- for 10th to 12th standard children.

However, PN’s most exemplary work is in the field of caring for the old and infirm. GCC, started in 2006, as a part of the PNH has four deluxe rooms and a 20-bed general ward. This ward is run on a charitable basis; most patients are terminal cases.

SSN, a home for people over 60, currently has 25 two-seater, fully furnished rooms, with attached baths and a small sit-out. There’s a dining room, recreation centre and library. Four simple and nutritious meals are served to inmates and all services, including housekeeping, laundry and conveyance to the city, are provided—all for Rs10,000/- per month. Only if an inmate is completely bed-ridden and needs special personal attendant, extra charges have to be paid.

The average age of SSN inmates is 80. They come from all walks of life, including academics, IAS officials and engineers. A former IAS officer, who did not want to be named, said: “It is the best arrangement, as a last alternative. At least I don’t have to worry about ordering provisions or whether the maid will turn up or not. And since there is a hospital within the premises, help is at hand in case of any medical emergency.” Since all the inmates are old and ailing, it does get a bit gloomy at times, he said.

Jaipur currently has few retirement homes so close to the city. Realising that the expanding city needs more such facilities, PN wants to add 100 rooms to SSN. They accept donations of Rs10 lakh per room from prospective inmates. If those who have paid for the room don’t move in immediately, PN rents the rooms to those in need. The income so obtained cross-subsidises GCC. On the death of these ‘owner-inmates’, the rooms revert to PN which can either sell or rent them.

Recently, in collaboration with Cure2children Foundation (Italy), PN started the South-east Asia Institute for Thalassaemia and has successfully done a bone marrow transplant free of cost. It raised the required donations of Rs9 lakh for this. Several such cases waiting for funding. Donations to Prem Niketan are tax-exempt under Section 80G of the Income Tax Act.

Source: http://www.moneylife.in/article/from-humanism-to-social-service/30845.html

प्रश्न- भगवान्‌ हमसे प्रेम करते हैं, यह कैसे मालूम हो? 

उत्तर- भगवान्‌ पर विश्वास हो और उनसे हमारा सम्बन्ध हो तब मालूम हो सकता है। जैसे माता अपने बच्चे के लिए तरसती है, वैसे ही भगवान्‌ अपने भक्त के लिए तरसते हैं। बच्चा काला-कलूटा, गूँगा-बहरा, लूला-लँगड़ा कैसा भी हो, माता उससे प्रेम करती है। बच्चा भी यह बात समझता है। भगवान्‌ में तो माता से अनेक गुना वात्सल्य है। फिर वे भक्त से प्रेम करें, इसमें कहना ही क्या ।

अत: जो एकमात्र भगवान्‌ को ही मानते हैं, उनको भगवान्‌ का प्रेम मिलता है। इसमें सन्देह नहीं है। यह भक्तों का अनुभव है। ईश्वर प्रेमीभक्त को ढूँढ़ता है। विचारशील साधक ईश्वर को ढूँढ़ता है।